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Sehatnama > Blog > Health & Diseases > गर्भावस्था में लापरवाही पड़ सकती है भारी, समय पर ये जांच हैं जरूरी
Health & DiseasesWomen's Health

गर्भावस्था में लापरवाही पड़ सकती है भारी, समय पर ये जांच हैं जरूरी

Saurabh Chaubey
Last updated: 2026/04/12 at 6:24 PM
By Saurabh Chaubey
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6 Min Read
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Highlights
  • प्रसव पूर्व जांच (ANC) के दौरान ही उच्च जोखिम गर्भावस्था की पहचान करना बेहद जरूरी है। उन्होंने बताया कि सभी गर्भवती महिलाओं को नियमित रूप से ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, एचआईवी, एसटीआई और अल्ट्रासोनोग्राफी जैसी जरूरी जांच जरूर करानी चाहिए

गर्भावस्था और उसके बाद मां बनने की पहचान किसी भी महिला के लिए न सिर्फ शारीरिक रूप से, बल्कि मानिसिक और भावनात्मक रूप से भी एक मील का पत्थर होता है। इस सुखद ऐहसास की तैयारी वह शादी होने के बाद से ही करने लगती है। घर में नन्हें-मुन्ने की किलकारी पूरे परिवार को न केवल बांध देती है, बल्कि नए रिश्तों का भी आगाज होता है। मां के अलावा, पापा, चाचा-चाची, मामा-मामी, फुआ-फूफाजी, दादा-दादी और नाना-नानी आदि रिश्तों का अपने आप ही सृजन हो जाता है।
हालांकि, यह बेहद अहम रिश्ता गर्भवती के लिए कई जोखिम को भी लेकर आता है, जिसमें गर्भ के दौरान होनेवाली परेशानियां हैं। यह शारीरिक और मानसिक दोनों होता है। कुछ महिलाओं की परेशानियां आम होती हैं, जो उनके घर के बुजुर्गों और डॉक्टरी सलाह के साथ-साथ जीवनसाथी के सहयोग से ठीक हो जाती हैं। इनमें ज्यादातर वैसी परेशानियां ऐसी होती हैं जो शुरुआती दिनों खासकर पहले ट्राइमेस्टर यानी तीन महिने में होती हैं।

Contents
शारीरिक परेशानियां:मानसिक परेशानियां:मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की पहल:

शारीरिक परेशानियां:

  • मतली और उल्टी (मॉर्निंग सिकनेस) : शुरुआती महीनों में बहुत आम लक्षण, 70–80% महिलाओं में होता है।
  • बहुत ज्यादा थकान : शरीर बच्चे के विकास के लिए ज्यादा ऊर्जा इस्तेमाल करता है।
  • चक्कर आना या कमजोरी : शरीर में ब्लड फ्लो बढ़ने से ऐसा हो सकता है।
  • बार-बार पेशाब आना : गर्भाशय बढ़ने से ब्लैडर पर दबाव पड़ता है।
  • स्तनों में दर्द या भारीपन : हार्मोन बढ़ने से यह सामान्य बदलाव है।
  • कब्ज या गैस : हार्मोन के कारण पाचन धीमा हो जाता है।

मानसिक परेशानियां:

  • मूड स्विंग (भावनाओं में उतार-चढ़ाव) : हार्मोन बदलाव और थकान के कारण।
  • चिड़चिड़ापन या गुस्सा : हार्मोनल बदलाव का असर।
  • चिंता या तनाव : नई स्थिति और शारीरिक बदलाव के कारण।
  • नींद की समस्या : हार्मोन बदलाव और शारीरिक असहजता से।

हालांकि, कुछ गर्भवतियों में अधिक जोखिम वाली समस्याएं होती हैं। ऐसे जोखिमों की समय पर पहचान जरूरी है, नहीं तो जच्चा-बच्चा दोनों की जान को खतरा होता है। ऐसी स्थिति से निपटने, इलाज और रेफरल को मजबूत बनाने के उद्देश्य से रांची में यूनिसेफ और स्वास्थ्य विभाग के संयुक्त तत्वावधान में एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित की गई। यह कार्यशाला सिविल सर्जन कार्यालय सभागार में संपन्न हुई, जिसमें मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने पर विशेष चर्चा की गई।

मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की पहल (प्रतीकात्मक तस्वीर)।

कार्यशाला को संबोधित करते हुए सिविल सर्जन डॉ. प्रभात कुमार ने कहा कि प्रसव पूर्व जांच (ANC) के दौरान ही उच्च जोखिम गर्भावस्था की पहचान करना बेहद जरूरी है। उन्होंने बताया कि सभी गर्भवती महिलाओं को नियमित रूप से ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, एचआईवी, एसटीआई और अल्ट्रासोनोग्राफी जैसी जरूरी जांच जरूर करानी चाहिए, ताकि जटिलताओं से बचाव किया जा सके। उन्होंने आगे बताया कि झारखंड में करीब 20 से 25 फीसदी महिलाओं में उच्च जोखिम का खतरा रहता है। जोकि इस प्रकार हैं:

1. एंटी पार्टम हेमरेज (Antepartum Hemorrhage): डिलीवरी से पहले (20 हफ्ते के बाद) गर्भावस्था में योनि से खून आना।

2. पोस्ट पार्टम हेमरेज (Postpartum Hemorrhage): बच्चे के जन्म के बाद ज्यादा मात्रा में खून बहना।

3. प्री-एक्लैंपसिया (Preeclampsia): गर्भावस्था में हाई ब्लड प्रेशर और पेशाब में प्रोटीन आना।

4. एक्लैंपसिया (Eclampsia) : प्री-एक्लैंपसिया के बाद दौरे (फिट) पड़ना।

5. यूटरिन रप्चर (Uterine Rupture) : प्रसव के दौरान गर्भाशय फट जाना (गंभीर आपात स्थिति)।

6. सेप्टिक शॉक (Septic Shock): शरीर में गंभीर संक्रमण के कारण ब्लड प्रेशर बहुत गिर जाना और अंग फेल होने का खतरा।

7. प्लेसेंटा पर्क्रेटा (Placenta Percreta) : प्लेसेंटा का गर्भाशय को पार कर आसपास के अंगों तक पहुंच जाना।

उन्होंने बताया कि ऐसे जोखिमों से बचने के लिए समय पर जांच जरूरी है। कार्यक्रम के दौरान डॉ असीम कुमार मांझी ने गर्भावस्था के दौरान संतुलित पोषण और आयरन की गोली सहित जरूरी दवाओं को डॉक्टर की सलाह अनुसार लेने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि सही पोषण मां और शिशु दोनों के स्वास्थ्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

 

मातृ स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की पहल:

राज्य पोषण कंसल्टेंट प्रतिभा सिंह ने गर्भावस्था के दौरान दिखने वाले खतरे के संकेतों की विस्तार से जानकारी दी। कार्यशाला के दौरान यूनिसेफ की अन्नपूर्णा ने प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान को प्रभावी तरीके से लागू करने की रणनीति पर चर्चा की और जमीनी स्तर पर सेवाओं को मजबूत करने पर जोर दिया। मातृ स्वास्थ्य कंसल्टेंट अन्नू कुमारी ने कहा कि समय पर जांच, सही पोषण और नियमित चिकित्सकीय निगरानी से मातृ मृत्यु दर और नवजात जटिलताओं को कम किया जा सकता है। इस तरह की कार्यशालाएं स्वास्थ्यकर्मियों की क्षमता बढ़ाने और समुदाय स्तर पर जागरूकता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाती हैं।

TAGGED: #ANCCheckup, #HighRiskPregnancy, #IronAndNutrition, #MaternalCare, #गर्भावस्थाजांच, #मातृस्वास्थ्य, #सुरक्षितमातृत्व, sehatnama.in, स्वस्थमां स्वस्थशिशु
Saurabh Chaubey April 12, 2026 February 13, 2026
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2 Comments 2 Comments
  • Jayden2665 says:
    March 27, 2026 at 6:24 am

    good

    Reply
  • Ruby280 says:
    April 11, 2026 at 5:56 pm

    Apply https://sehatnama.in/fcm-therapy-to-combat-anemia-begins-today-read-all-about-it/

    Reply

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