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टी-बैग और प्लास्टिक कप में चाय के साथ आप पी रहे लाखों कण माइक्रोप्लास्टिक, कैंसर का खतरा

हृदय रोग से जुड़े मरीजों में ब्लॉकेज का एक कारण प्लास्टिक के कण भी हैं। कई बार सर्जरी में भी प्लास्टिक के महीन टुकड‍़े मरीजों के हृदय में पाये गए हैं। साथ ही यह किडनी, लीवर, फेफड़ा और मस्तिष्क सहित अन्य अंगों में भी रक्त में मिलकर जा रहा है और शरीर को सीधा नुकसान पहुंचा रहा है।

Saurabh Chaubey
Last updated: 2025/01/25 at 6:22 PM
By Saurabh Chaubey
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7 Min Read
Teabags and plastic cups causes cancer
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Highlights
  • प्लास्टिक के बर्तनों में चाय, पानी, सूप और भोजन करने से गर्म होने के कारण माइक्रोप्लास्टिक (प्लास्टिक के छोटे कण) आहार और पेय में मिल जाते हैं। ये कण आहार नली से खून में मिलकर शरीर के सभी अंगों तक पहुंच जाते हैं। ऐसे में ये प्लास्टिक के कण धमनियों में ब्लॉकेज (अवरोध) का काम करते हैं।

टी-बैग और प्लास्टिक कप (teabags and plastic cups causes cancer) से ये प्लास्टिक गर्म होने के बाद चाय में मिलकर हमारे आंतों द्वारा अवशोषित हो रहे हैं। इससे हार्ट अटैक और विभिन्न तरह के कैंसर का खतरा बढ़ गया है, जिसमें कोलन कैंसर यानी आंत का कैंसर होने की संभावना सर्वाधिक है।

Contents
भारत में चाय की चुस्की के आंकड़े :यह भी पढ़ें: 14 फीसदी महिलाएं प्रेग्नेंसी के बाद होती हैं डिप्रेशन का शिकारक्यों चिंताजन है स्थिति :खाद्य पैकेजिंग में माइक्रोप्लास्टिक खतरनाकक्यों हानिकारक है माइक्रोप्लास्टिक्समाइक्रोप्लास्टिक का प्रमुख स्रोत टीबैग

बार्सिलोना के ऑटोनोमस विश्वविद्यालय (autonomous university of Barcelona, Spain) के वैज्ञानिकों ने इसको लेकर शोध किया है, जो कीमोस्फीयर (Chemosphere ) के नवंबर, 2024 के अंक में प्रकाशित हुआ है। इस शोध में पाया गया कि पॉलिमर आधारित चाय की थैलियों से लाखों माइक्रोप्लास्टिक और नैनोप्लास्टिक (एमएनपीएल) निकलते हैं। चाय की थैलियों का उपयोग करने पर ये कण गर्म पानी में निकल जाते हैं, जिसका सीधा प्रभाव हमारे स्वास्थ्य और पर्यावरण पर भी पड‍़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा कॉफी, सूप और अन्य खाद्य सामग्रियों के साथ भी संभव है, जो प्लास्टिक के बर्तनों में खाया या पीया जाता है।

 

भारत में चाय की चुस्की के आंकड़े :

टी-बोर्ड ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार भारत की कुल आबादी का 65 फीसदी हिस्सा चाय का सेवन करता है। 12 साल के ऊपर की उम्र में चाय का सेवन करीब 96 फीसदी तक है। वहीं, कुल मिलाकर देखा जाए तो भारत के 88 फीसदी घरों में चाय का सेवन किया जाता है। इसमें शहरी क्षेत्र के 80 फीसदी घरों में वहीं ग्रामीण क्षेत्र के 75 फीसदी घरों में चाय का सेवन हो रहा है। उत्तरी (32 फीसदी) और पश्चमी भारत (31 फीसदी) में चाय का सेवन पूरे भारत का 63 फीसदी है। पूवी और पूर्वोत्तर भारत में यह 19 फीसदी जबकि दक्षिणी भारत में यह महज 18 फीसदी है।

यह भी पढ़ें: 14 फीसदी महिलाएं प्रेग्नेंसी के बाद होती हैं डिप्रेशन का शिकार

क्यों चिंताजन है स्थिति :

स्थिति इसलिए चिंताजनक है कि आजकल ट्रेनों, बसों, फ्लाइट और बड़े होटलों में जो चाय दी जाती है, उसका 80-90 फीसदी हिस्सा टी-बैग के रूप में उपयोग किया जाता है। होटलों में भी भले ही महंगे शीशा (कांच) या बोन चाइना के कप गिलास उपयोग किया जाता हो, पर वहां भी पानी के लिए प्लास्टिक बोतल चाय के लिए टी-बैग का उपयोग किया जाता है। कमरे में भी यह कॉम्प्लीमेंट्री पैकेज का हिस्सा होता है। कॉरपोरेट घराना इसे स्टेटस का सिंबल भी मानता है। यदि किसी होटल या रेस्ट्रां में फिल्टर किया हुआ पानी गिलास में परोसा जाए तो भी लोग बोतलबंद पानी ऑर्डर करते हैं। हालांकि, यह स्टेटस सिंबल स्वास्थ्य के लिए कितना हानिकारक है, इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है। शोध के अनुसार सिर्फ एक कप चाय के लिए टी-बैग का उपयोग करने से आप माइक्रोप्लास्टिक के लाखों कणों का सेवन कर लेते हैं। साथ ही यदि वह चाय यदि प्लास्टिक कप में सेवन करते हैं तो माइक्रोप्लास्टिक कणों की संख्या और बढ‍़ जाती है।

test image of tea bags used for the research (picture : chemosphare )

 

खाद्य पैकेजिंग में माइक्रोप्लास्टिक खतरनाक

बोतलों, कंटेनरों, पाउच, फिल्मों और कप सहित प्लास्टिक पैकेजिंग से खाद्य और पेय पदार्थों में माइक्रोप्लास्टिक्स (5 मिमी से 1 माइक्रोन) और नैनोप्लास्टिक्स (<1 माइक्रोन) जिसे संक्षेप में एमएनपीएल (MNPL) कहा जाता है, उत्सर्जित होता है। इन कणों का नुकसान उनके भौतिक-रासायनिक गुणों पर निर्भर करता है। खाद्य पैकेजिंग में आमतौर पर इस्तेमाल की जाने वाली प्लास्टिक सामग्री में उच्च घनत्व वाली पॉलीथीन (एचडीपीई), कम घनत्व वाली पॉलीथीन (एलडीपीई), पॉलीप्रोपाइलीन (पीपी), पॉलीइथिलीन टेरेफ्थेलेट (पीईटी) जैसे पॉलिएस्टर और पॉलीस्टाइनिन (पीएस) शामिल हैं। ये प्लास्टिक कई खाद्य उत्पादों में एमएनपीएल छोड़ सकते हैं, जैसे बोतलबंद पानी, चावल पकाने के बैग, टीबैग और होम डिलिवरी के लिए पैक करने वाले कंटेनर। एमएनपीएल का उत्सर्जन नमी, गर्मी, प्रकाश आदि पर्यावरणीय कारकों पर भी निर्भर करता है।

क्यों हानिकारक है माइक्रोप्लास्टिक्स

हालांकि, MNPLs के स्वास्थ्य प्रभावों पर अभी भी अध्ययन जारी है। खासकर उसके पाचनतंत्र में अवशोषण के बाद इसका ऊतकों पर क्या प्रभाव पड़ेगा इस पर शोध चल रहा है। अब तक के शोध से पता चलता है कि जो मनुष्य अक्सर MNPLs के संपर्क में आते हैं, विशेष रूप से पाचन और श्वसन तंत्र से संबंधित, जैसे कि फेफड़े, रक्त, मल और मूत्र उनके स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ता है। उदाहरण के लिए, स्वस्थ व्यक्तियों के मानव मल के नमूनों में प्रति 10 ग्राम में औसतन 20 MNPLs पाए गए हैं, जिसमें पॉलीप्रोपाइलीन (PP) और PET सबसे प्रचलित प्लास्टिक हैं। सूजन आंत्र रोग (Inflammatory bowel disease) के रोगियों के मल में स्वस्थ व्यक्तियों की तुलना में एमएनपीएल आधिक पाये गए हैं। इसका मतलब यह है कि आईबीडी वाले रोगियों में प्लास्टिक के कण अधिक पाये गए हैं।

 

माइक्रोप्लास्टिक का प्रमुख स्रोत टीबैग

अब तक टीबैग को एमएनपीएल या माइक्रोप्लास्टिक के स्रोत के रूप में अनदेखा किया जाता था। हाल के अध्ययनों से संकेत मिलता है कि टीबैग लाखों एमएनपीएल जारी करते हैं, जो सीधे तौर पर स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रहे हैं। पीएमचीएच में चेस्ट और हार्ट सर्जन डॉ सुभाष झा का कहना है कि अब हृदय रोग से जुड़े मरीजों में ब्लॉकेज का एक कारण प्लास्टिक के कण भी हैं। कई बार सर्जरी में भी प्लास्टिक के महीन टुकड‍़े मरीजों के हृदय में पाये गए हैं। साथ ही यह किडनी, लीवर, फेफड़ा और मस्तिष्क सहित अन्य अंगों में भी रक्त में मिलकर जा रहा है और शरीर को सीधा नुकसान पहुंचा रहा है। उनका कहना है कि जो प्लास्टिक जमीन को बंजर बना सकता है। उसकी उर्रवरा क्षमता को कम कर सकता है, वह इंसान या जानवरों के शरीर में चला जाए तो वह कितना नुकसानदायक होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

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Saurabh Chaubey January 25, 2025 January 4, 2025
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1 Comment 1 Comment
  • Mia (Area 52) says:
    June 2, 2025 at 9:40 am

    Nice share

    Reply

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