रांची : राष्ट्रीय ट्यूबरोक्लोसिस (टीबी) उन्मूलन कार्यक्रम National Tuberculosis Elimination Program (NTEP) को प्रभावी बनाने के लिए रांची में दो दिवसीय विशेष प्रशिक्षण का शिविर का आयोजन किया गया। इसका मूल उद्देश्य टीबी की जांच व्यवस्था को मजबूत करना था। इसके लिए लेबोरेटरी टेक्नीशियन (LT ) और सीनियर टीबी लैब सुपरवाइजरों (STLS ) को इस कार्यक्रम में प्रशिक्षण दिया गया।
यह प्रशिक्षण सिविल सर्जन कार्यालय के सभागार में आयोजित किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता रांची के सिविल सर्जन डॉ प्रभात कुमार ने की । कार्यक्रम में जिला यक्ष्मा पदाधिकारी डॉ. एस. वास्की, डीपीसी राकेश कुमार राय सहित जिला स्तर के स्वास्थ्य अधिकारी और कर्मी मौजूद रहे।
प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य टीबी मरीजों की जांच संख्या बढ़ाना, जांच की गुणवत्ता में सुधार करना और टीबी मुक्त पंचायत अभियान को तेजी देना था। प्रशिक्षण के दौरान आधुनिक जांच प्रक्रिया, गुणवत्ता नियंत्रण, सैंपल मैनेजमेंट और रिपोर्टिंग सिस्टम पर विस्तार आदि से जुड़ी हुई जानकारी दी गई।
राज्य स्तर से आए माइक्रोबायोलॉजिस्ट रूपेश कुमार और External Quality Assessment (EQA) माइक्रायोबायोलॉजिस्ट रविन्द्र कुमार ने तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान किया। प्रशिक्षण में जिले के सभी प्रखंडों से दो-दो लैब टेक्नीशियन और एक-एक STLS को शामिल किया गया था।
स्वास्थ्य अधिकारियों ने निर्देश दिया कि सभी स्वास्थ्य कर्मी मरीजों के साथ बेहतर व्यवहार सुनिश्चित करेंगे। पोर्टल पर समय पर डेटा अपलोड करें और नियमित रूप से जिला स्तर पर रिपोर्ट भेजें।

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, इस तरह के तकनीकी प्रशिक्षण कार्यक्रम टीबी उन्मूलन लक्ष्य को प्राप्त करने में अहम भूमिका निभा रहे हैं और आने वाले समय में टीबी मुक्त समाज बनाने में मदद करेंगे। इस अवसर पर सिविल सर्जन डॉ प्रभात कुमार ने कहा कि झारखंड में टीबी उन्मूलन को लेकर स्वास्थ्य विभाग ज्यादा सजग और प्रयासरत है।
झारखंड में ICMR के अध्ययन को WHO ने टीबी में देखभाल का मॉडल माना
आकाशवाणी (AIR) की एक रिपोर्ट के अनुसार झारखंड में भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) द्वारा किए गए अध्ययन की विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने टीबी देखभाल के मॉडल के रूप में सराहना की है। वर्ष 2023 में द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ में प्रकाशित RATIONS अध्ययन में पाया गया कि टीबी मरीजों को पोषण सहायता देने से उपचार के परिणामों में उल्लेखनीय सुधार हुआ और मृत्यु दर में कमी आई है। अध्ययन के अनुसार, जिन मरीजों को खाद्य राशन उपलब्ध कराया गया, उनमें सामान्य उपचार लेने वाले मरीजों की तुलना में बेहतर रिकवरी और जीवित रहने की दर देखी गई। इसके प्रभाव को देखते हुए WHO ने दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र के देशों से अपील की है कि वे टीबी को पूरी तरह खत्म करने के लिए इस तरह की रणनीति को अपनाएं। विशेषज्ञों का मानना है कि टीबी उपचार में पोषण सहायता को शामिल करना इस बीमारी को खत्म करने की दिशा में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।
झारखंड में टीबी का उपचार राष्ट्रीय औसत से बेहतर:
राज्य ने वर्ष 2023 में 88% उपचार सफलता दर हासिल की, जो राष्ट्रीय औसत 85% से अधिक है। टीबी के कुल मामलों में कमी आई है। वर्ष 2022 में जहां 57,567 मामले थे, वहीं सितंबर 2025 तक यह संख्या घटकर लगभग 48,000 रह गई। अध्ययनों के अनुसार 69% टीबी मरीज पुरुष हैं और यह बीमारी 15–44 वर्ष आयु वर्ग को सबसे अधिक प्रभावित करती है। कुछ जिलों जैसे पूर्वी सिंहभूम में 83.6% मरीज अनुसूचित जनजाति समुदाय से हैं।
उपचार और सहायता (Treatment & Support):
राज्य में RATIONS स्टडी मॉडल लागू किया गया है, जो पोषण सहायता के माध्यम से मरीजों के उपचार परिणाम बेहतर बनाता है। साथ ही मरीजों को डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के माध्यम से आर्थिक सहायता दी जाती है या वे इसके पात्र होते हैं। प्रगति के बावजूद टीबी अभी भी एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या बनी हुई है। फेफड़ों की टीबी (Pulmonary TB) के मामले लगभग 86% हैं और कुछ मामलों में दवा प्रतिरोध (Drug Resistance) भी देखा जा रहा है। जिसका मुख्य कारण टीबी की एक-दो खुराक खाकर बीच में छोड़ देना माना जाता है। पूर्ण इलाज नहीं होने के कारण टीबी और घातक होने लगती है और दवा का डोज बढ़ाना पड़ता है।


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