साफ-सफाई की कमी और आसपास में जलजमाव से पनपी गंदगियों के कारण मच्छरों का प्रकोप काफी बढ़ गया है। इस कारण विभिन्न राज्यों में मलेरिया, डेंगू और चिकिनगुनिया के मामले काफी बढ़े हैं। समुचित देखभाल और उपचार के अभाव में ये बीमारियां जानलेवा बन सकती हैं। इनसे बचाव के लिए कुछ एहतियात जरूरी हैं- जिनमें अपने आसपास सफाई रखना, जलजमाव नहीं होने देना, पुराने टायर, डिब्बे और अन्य सामग्री जिसमें जलजमाव की स्थिति हो सकती है को पलटकर रखना या हटा देना। घर के पास यदि गड्ढे हों तो उसको बालू या मिट्टी से भर देना।

आयुर्वेद से भी इन रोगों का इलाज संभव है। डेंगू और मलेरिया में शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होने लगती है। शरीर में तेज दर्द, ऐंठन और तेज बुखार की अनुभूति होती है। आयुर्वेद के अनुसार बुखार शरीर के तापमान के सामान्य से अधिक बढ़ने और शरीर की कार्यक्षमता गड़बड़ाने से होता है। इसे त्रिदोष विकार से जोड़ा गया है।
इससे शरीर का तापमान बढ़ जाता है। वात, पित्त और कफ दोष में असंतुलन से बुखार के साथ सर्दी-जुकाम, नाक बहना, बलगम, गला बैठना, सिर दर्द, बदन दर्द जैसे लक्षण भी पाए जाते हैं। त्रिदोष होने पर जठराग्नि (digestive fire) हमारे अमाशय में मौजूद विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालना शुरू कर देती है, जिससे यह खून के साथ शरीर में फैल जाती है।
आयुर्वेद में डेंगू को दंडक या ब्रेकबोन फीवर भी कहा जाता है। यह आर्बोवायरस है यानी संक्रमित व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फ्लेवी वायरस के फैलने से होता है और यह वायरस एडीज एजिप्टी मच्छर(Aedes aegypti mosquito)। यह बरसात के मौसम में रुके हुए पानी में तेजी से पनपने वाले धारीदार मच्छर होते हैं, जो दिन के समय काटते हैं। जब एडीज मच्छर डेंगू से पीड़ित व्यक्ति को काटता है, तो सबसे पहले वो खुद संक्रमित हो जाता है। फिर उसके काटने दूसरे व्यक्ति केा काटता है, तो वह डेंगू के वायरस उसके शरीर में पहुंचा देता है।
3-4 दिन के बाद ही दिखते हैं लक्षण:
डेंगू के वायरस शरीर में पहुंचने के बाद तुरंत अपना प्रभाव नहीं दिखाते हैं। शरीर की गर्मी से पनपते हैं और 3-4 दिन बाद अपना काम शुरू करते हैं। इससे शरीर की रक्त संचार प्रणाली को प्रभावित होने लगती है। ब्लड प्लेटलेट्स काउंट कम होने लगता है। रोगी की इम्यूनिटी (रोग प्रतिरोधक क्षमता) कम हो जाती है। वह बहुत कमजोरी महसूस करने लगता है। तेज बदन दर्द के कारण इस बुखार को ब्रेकबोन भी कहा जाता है।
डेंगू के लक्षण हों तो तुरंत डॉक्टर के पास ले जाएं। डेंगू की जांच कराएं। जरूरी नहीं है कि इलाज के दौरान (किसी भी विधि से इलाज जैसे- आयुर्वेद, होमियोपैथ या फिर एलोपैथ) ब्लड प्लेटलेट की संख्या पूरी तरह ठीक हो जाए। इसलिए लंबे समय तक सावधानी बरतनी होगी। ज्यादा से ज्यादा आराम करें। पानी भरपूर मात्रा में पीना पीएं। पानी उबला हुआ पीएं। असहनीय दर्द से राहत के लिए ब्रूफिन की जगह पैरासिटामोल लें। बुखार तेज होने पर आप आयुर्वेदिक डॉक्टर की सलाह पर – सुदर्शन चूर्ण, त्रिभुवन कीर्ति रस, अमरुथारिस्ता, गिलोयघन वटी ले सकते हैं।
आयुर्वेद के हिसाब से कुछ घरेलू उपाय भी इसमें कारगर हैं
- तुलसी की पत्ते, काली मिर्च, सौंठ, इलायची और थोड़ा सा गुड़ पानी में उबालकर तैयार काढ़ा पी सकते हैं
- तुलसी के पत्तों में अदरक का रस और शहद मिलाकर पीएं
- तुलसी, अदरक, काली मिर्च डालकर हर्बल चाय पीएं
- तुलसी के पत्तों को पानी में उबालकर शहद मिलाकर पीएं
- लौंग और इलायची का काढ़ा पीएं
- मेथी के पत्ते या बीज को पानी में कम से कम एक घंटा भिगोकर काढा बना पीएं
- अमृत या गिलोय का काढा गुड़ मिलाकर पीना भी फायदेमंद है
- ऐलोवेरा का रस, पपीते के पत्तों का रस मिलाकर पीना फायदेमंद है
- पपीते के पत्तों को मिक्सी में पीसकर बना रस दिन में दो बार 2-3 चम्मच लें या पत्तों को उबाल कर काढ़ा बनाकर पीएं
इसके अलावा अनार का जूस, नारियल पानी, नीबू पानी आदि का सेवन कर सकते हैं। ध्यान रखें कि शरीर में पानी और मिनरल्स की कमी न हो। जो फल अच्छा लगे वहीं खाएं या जूस पीएं। हालांकि, ध्यान रहे कि सड़कों पर मिलने वाले जूस से परहेज करें। क्योंकि सफाई नहीं होने पर यह आपके संक्रमण को और बढ़ा सकता है। खाना में तेल मसाला छोड़कर सभी आसानी से पचने वाला आहार लें।
डॉ कमलेश कुमार, आयुर्वेद विशेषज्ञ, रांची से बातचीत पर आधारित

