रांची: पशु के काटने के बाद शुरुआती समय बेहद महत्वपूर्ण होता है। कुत्ते या किसी अन्य संभावित संक्रमित पशु के काटने या खरोंचने पर घाव को तुरंत साबुन और साफ पानी से लगभग 15 मिनट तक अच्छी तरह धोना चाहिए। इसके बाद बिना देरी किए नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पहुंचकर चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। ये बातें रांची के सिविल सर्जन डॉ. अमरेंद्र प्रसाद ने विश्व रेबीज जागरुकता दिवस के अवसर पर कहीं। वे सदर अस्पताल, रांची में रेबीज की रोकथाम एवं बचाव को लेकर आयोजित कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। कार्यक्रम का उद्देश्य था- आमजनों को रेबीज से बचाव, पशु के काटने या खरोंचने के बाद अपनाए जाने वाले तत्काल उपाय, समय पर चिकित्सकीय परामर्श और एंटी-रेबीज टीकाकरण के महत्व के बारे में जानकारी देना।
उन्होंने कहा कि रेबीज के लक्षण विकसित होने के बाद यह बीमारी जानलेवा हो जाती है, लेकिन पशु के काटने के बाद समय पर उचित चिकित्सा, चिकित्सकीय सलाह के अनुसार एंटी-रेबीज टीकाकरण तथा आवश्यकतानुसार अन्य उपचार अपनाकर मरीज की जान बचाई जा सकती है। सिविल सर्जन ने आमजनों से अपील की कि पशु के काटने या खरोंचने की घटना को हल्के में न लें और तत्काल नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पहुंचें।

रेबीज: सालाना 5726 लोंगों की मौत भारत में

रेबीज: सालाना 5726 लोंगों की मौत भारत में
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आंकड़ों के अनुसार विश्व में सालाना 59 हजार लोगों की मौत हो जाती है रेबीज के कारण। इसमें से 99 प्रतिशत कुत्तों के काटने के कारण यह बीमारी होती है। साल 2024 में 90.1 लाख लोगों में एनिमल बाइट यानी कुत्तों के अलावा अन्य जानवरों द्वारा मनुष्यों को काटने की रिपोर्ट भारत में दर्ज की गई। समय पर टीकाकारण नहीं कराने से बाद में रेबीज के लक्षण देखने को मिलता है। हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार लक्षण सामने आने तक काफी देरी हो चुकी होती है। इसलिए जैसे ही इस तरह की कोई घटना हो तो तुरंत काटे गए जगह को करीब 15 मिनट तक साफ पानी और साबुन से धोना चाहिए। इसके बाद तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर जाकर इलाज कराना चाहिए। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के अनुसार सालाना 5726 लोंगों की मौत भारत में अभी भी रेबीज के कारण होती है।
सदर अस्पताल में 24×7 एंटी-रेबीज वैक्सीन उपलब्ध
डायरेक्टर सह राज्य नोडल पदाधिकारी, राष्ट्रीय रेबीज कंट्रोल प्रोग्राम (NRCP) डॉ. प्रभात कुमार ने कहा कि सही जानकारी और व्यापक जनजागरुकता से रेबीज की रोकथाम संभव है। पशु के काटने के बाद घबराने के बजाय तत्काल घाव को साबुन एवं बहते पानी से धोकर स्वास्थ्य केंद्र पहुंचना चाहिए। रेबीज से होने वाली मृत्यु के मामलों की रिपोर्टिंग कई बार नहीं हो पाती है। इसलिए रेबीज से संदिग्ध अथवा संबंधित मृत्यु के मामलों की अनिवार्य रिपोर्टिंग होनी चाहिए।
डॉ. प्रभात कुमार ने बताया कि जिला अस्पताल में 24×7 एंटी-रेबीज वैक्सीन उपलब्ध है तथा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) में भी वैक्सीन की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। आने वाले दिनों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) स्तर तक भी एंटी-रेबीज वैक्सीन उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सभी स्वास्थ्य केंद्रों में वाउंड वॉशिंग एरिया की व्यवस्था होना आवश्यक है, ताकि पशु के काटने के बाद मरीज को तत्काल प्राथमिक उपचार उपलब्ध कराया जा सके।
2030 तक रेबीज से होने वाली मौतों को समाप्त करने का लक्ष्य
राज्य महामारी रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रवीण कर्ण ने बताया कि 22 से 28 सितंबर के बीच रेबीज से बचाव को लेकर विशेष जनजागरुकता अभियान चलाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि रेबीज से बचाव के लिए पूरी जानकारी और समय पर टीकाकरण बेहद महत्वपूर्ण है। सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 तक रेबीज से होने वाली मौतों को समाप्त करना है।

रेबीज से बचाव में PEP की महत्वपूर्ण भूमिका
RIMS के डॉ. मनोज कुमार ने कहा कि रेबीज वायरस से होने वाली गंभीर बीमारी है। यदि किसी व्यक्ति को कुत्ते अथवा किसी अन्य पालतू या संभावित संक्रमित जानवर ने काटा या खरोंचा है, तो चिकित्सकीय सलाह के अनुसार रेबीज का पूरा टीकाकरण कराना आवश्यक है।
डॉ. सैमसन टोप्पो ने बताया कि रेबीज से बचाव में पोस्ट-एक्सपोजर प्रोफिलैक्सिस (PEP) महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें घाव का उचित प्रबंधन, आवश्यकतानुसार रेबीज वैक्सीन तथा कुछ गंभीर प्रकार के संपर्क में रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन शामिल हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि उचित घाव प्रबंधन और गुणवत्तापूर्ण PEP की समय पर उपलब्धता मानव रेबीज से होने वाली मृत्यु को लगभग पूरी तरह रोकने में सक्षम है।
पालतू जानवरों का समय पर कराएं वैक्सीनेशन
राज्य नोडल पदाधिकारी IEC डॉ. राहुल किशोर ने कहा कि रेबीज से बचाव के लिए जनसहभागिता भी बेहद जरूरी है। यदि घर में पालतू जानवर रखा जाता है, तो उसका समय पर वैक्सीनेशन कराया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जानवर के काटने के बाद किसी भी प्रकार का घरेलू अथवा स्वयं से उपचार करने के बजाय तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पहुंचकर चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।
स्कूली शिक्षा से जोड़ने पर जोर
डॉ. बी.एन. चौरसिया ने कहा कि रेबीज की रोकथाम के लिए स्कूली शिक्षा में इसे जोड़ना होगा। स्कूली स्तर पर बच्चों को रेबीज के कारण, बचाव के उपाय तथा पशु के काटने के बाद किए जाने वाले तत्काल उपायों की जानकारी दी जानी चाहिए। कार्यक्रम के दौरान उपस्थित स्वास्थ्यकर्मियों एवं आमजनों को रेबीज संक्रमण, पशु के काटने एवं खरोंचने के बाद किए जाने वाले प्राथमिक उपाय, समय पर चिकित्सकीय परामर्श एवं टीकाकरण तथा पालतू जानवरों के नियमित टीकाकरण के संबंध में विस्तृत जानकारी दी गई।
कार्यक्रम में डॉ. राजीव भूषण, जिला कार्यक्रम पदाधिकारी, प्रवीण कुमार सिंह, प्रीति चौधरी, हैदर अली सहित अन्य पदाधिकारी एवं स्वास्थ्यकर्मी उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में जिला कार्यक्रम प्रबंधक प्रवीण कुमार सिंह ने सभी का धन्यवाद ज्ञापन किया।

